Swami Dayanand Saraswati Jayanti : आधुनिक भारत के निर्माता स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में।

समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को काठियावाड़ क्षेत्र, जिला राजकोट, गुजरात, मोरबी (मुंबई की मोरवी रियासत) के पास एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

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Swami Dayanand Saraswati Jayanti Kab Manaya Jata Hai?
Date भारत में हर साल 26 फरवरी को मनाया जाता है।
जन्म: स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ था.
मृत्यु: 30 October 1883 (aged 59); Ajmer Gujrat में दीपावली के दिन शाम को स्वामी जी की मृत्यु हो गई।
Swami Dayanand Saraswati Jayanti

मूल नक्षत्र में जन्म के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया। उन्होंने वेदों के महान विद्वान स्वामी विरजानंद जी से शिक्षा प्राप्त की थी। कई शिष्य स्वामी विरजानंद (दांडी स्वामी) के स्कूल में आते थे, कुछ समय के लिए रुकते थे लेकिन उनके क्रोध के कारण भाग जाते थे, क्योंकि इनकी यातना को सहन करने में असमर्थ होते थे।

दयानन्द सरस्वती को उनसे कई बार दण्ड भी मिला, लेकिन वे दृढ़ निश्चयी थे, इसलिए उन्होंने पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का संकल्प लिया, अडिग रहे।

एक दिन विरजानंद स्वामी को क्रोध आ गया और उन्होंने दयानन्द को अपने हाथ में रखी छड़ी से खूब पीटा। मूर्ख, निकम्मे, धूर्त... पता नहीं वे क्या कहते चले गए।

दयानन्द के हाथ में चोट लग गई, बहुत दर्द हो रहा था, लेकिन दयानन्द को जरा भी बुरा नहीं लगा, पर उठकर गुरूजी का हाथ अपने हाथ में लेकर दुलारते हुए कहा- आपके कोमल हाथों में चोट लगी होगी। मुझे इसके लिए खेद है।

दांडी स्वामी ने दयानन्द का हाथ झटकरते हुए कहा- 'पहले मूर्खता करता है, फिर चमचागिरी करता है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है।' यह नजारा स्कूल के सभी छात्रों ने देखा।

उनमें से एक नयनसुख था, जो गुरुजी का प्रिय छात्र था। नयनसुख को दयानन्द के प्रति सहानुभूति हुई, उठकर गुरुजी के पास जाकर बड़े संयम से कहा - 'गुरुजी! आप यह भी जानते हैं कि दयानंद मेधावी छात्र हैं, वह मेहनत भी करते हैं।

दांडी स्वामी को अपनी गलती का एहसास हो गया था। अब उन्होंने दयानंद को अपने पास बुला लिया। उन्होंने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा - भविष्य में हम पूरा ख्याल रखेंगे और पूरा सम्मान देंगे।

छुट्टी खत्म होते ही दयानन्द नयनसुख के पास गए और बोले- 'तुमने मेरी सिफारिश करके अच्छा नहीं किया, गुरूजी हमारे शुभचिंतक हैं। अगर हमें सजा देते हैं, तो यह हमारे भले के लिए ही है।

यह दयानंद बाद में महर्षि दयानन्द बने और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए 'आर्य समाज' के संस्थापक के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुए। आर्य समाज की स्थापना के साथ ही भारत में धँसी हुई वैदिक परम्पराओं को पुनः स्थापित करके विश्व में हिन्दू धर्म को मान्यता मिली।

उन्होंने हिंदी में ग्रंथों की रचना शुरू की और संस्कृत में लिखे गए पहले के ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। भारतीय स्वतंत्रता अभियान में महर्षि दयानंद सरस्वती का भी बहुत बड़ा योगदान था।

वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया और पंडितों और विद्वानों को वेदों का महत्व समझाया। स्वामीजी संस्कृत भाषा के अपने अपार ज्ञान के कारण संस्कृत को क्रमबद्ध रूप में बोलते थे।

ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रंथों पर बहुत विचार-मंथन करने के बाद, उन्होंने अकेले ही तीन मोर्चों पर अपना संघर्ष शुरू किया, जिसमें उन्हें अपमान, कलंक और कई कष्टों का सामना करना पड़ा। दयानन्द की बुद्धि का कोई उत्तर नहीं था। किसी भी धर्मगुरु के पास इसका उत्तर नहीं था कि वे क्या कह रहे हैं।

'भारत भारतीयों का है' उनका मुख्य उद्गार है। स्वामीजी के नेतृत्व में 1857 की स्वतंत्रता संग्राम क्रांति की पूरी योजना तैयार की गई और वे इसके प्रमुख सूत्रधार थे।

अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आकर भारत में 'भारत भारतीयों का है' कहने का साहस केवल दयानन्द में ही था। उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से भारत के लोगों को राष्ट्रवाद का उपदेश दिया और भारतीयों को देश पर मरने के लिए प्रेरित करते रहे।

एक बार औपचारिक वार्ता के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा स्वामी जी के सामने एक मामला रखा गया था कि यदि आप अपने व्याख्यान की शुरुआत में भगवान से प्रार्थना करते हैं, तो क्या आप ब्रिटिश सरकार के कल्याण के लिए भी प्रार्थना कर पाएंगे।

तो स्वामी दयानन्द ने बड़े साहस के साथ उत्तर दिया 'मैं ऐसी कोई बात स्वीकार नहीं कर सकता। यह मेरा स्पष्ट विश्वास है कि अपने देशवासियों की निर्बाध प्रगति के लिए और भारत को एक सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के लिए, मैं भगवान से यह प्रार्थना करता हूं कि मेरे देशवासी जल्द ही विदेशी शक्ति के चंगुल से मुक्त हो जाएं।

और उनके तीखे जवाब से स्तब्ध होकर ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें खत्म करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे थे। 1883 में दीपावली के दिन शाम को स्वामी जी की मृत्यु हो गई।

स्वामी दयानंद के उल्लेखनीय कार्य

1886 में, स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज द्वारा लाहौर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की गई थी।

स्वामीजी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को फिर से हिंदू बनने के लिए प्रेरित करके शुद्धि आंदोलन की शुरुआत की।

स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक और कई वेदभाष्य हिंदी भाषा में लिखे।

वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानन्द ने कांगड़ी में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की।

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