Yashoda Jayanti Kab Hai? यशोदा जयंती का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार | Shree Krishn और Mata Yashoda Story

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माता Yashoda Jayanti फाल्गुन माह में मनाया जाता है। द्रुक पंचांग के अनुसार, उत्तर भारतीय कैलेंडर के अनुसार, फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष षष्ठी को मां यशोदा जयंती मनाई जाती है।

Yashoda Jayanti Kab Hai?

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यशोदा जयंती फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। इसी दिन भगवान कृष्ण की पालन-पोषण करने वाली माता यशोदा का जन्म हुआ था। इस दिन, भक्त भगवान कृष्ण और माता यशोदा की पूजा करते हैं।

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Yashoda Jayanti कब है?
Date 12 February, 2023 रविवार को
विवरण इसी दिन भगवान कृष्ण की पालन-पोषण करने वाली माता यशोदा का जन्म फाल्गुन के महीने में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था।
Yashoda Mata and Shri Krishna Bhagwan

यशोदा जयंती का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार

माना जाता है कि माता यशोदा का जन्म फाल्गुन के महीने में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था। कृष्ण के पिता वासुदेव ने मामा कंस के आतंक से बचाने के लिए कृष्ण को गोकुल में नंद बाबा के पास छोड़ दिया। नंद बाबा की पत्नी यशोदा थीं और उन्होंने कृष्ण जी की परवरिश की थी, इसलिए कृष्ण जी को माता यशोदा की संतान के रूप में जाना जाता है।

Yashoda Mata aur Bhagwan Shree Krishn ki Story

कहा जाता है कि अपने पूर्व जन्म में माता यशोदा ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे वर मांगने को कहा। माता ने कहा, हे भगवान, मेरी तपस्या तभी पूरी होगी जब आप मुझे अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करेंगे। भगवान ने उन्हें प्रसन्न किया और कहा कि आने वाले समय में मैं वासुदेव और देवकी की माँ के घर में जन्म लूंगा, लेकिन मुझे तुमसे मातृत्व का सुख मिलेगा।

यह समय के साथ हुआ और भगवान कृष्ण देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के रूप में प्रकट हुए, क्योंकि कंस को पता था कि देवकी और वासुदेव के बच्चों द्वारा ही उसका वध किया जाएगा, इसलिए कंस अपनी बहन और वासुदेव को कैद में डाल दिया। जब कृष्ण का जन्म हुआ, तब वासुदेव ने उन्हें नंद बाबा और यशोदा मैया के घर छोड़ दिया ताकि उनका अच्छे से पालन पोषण हो सके।

पौराणिक ग्रंथों में यशोदा को नंद की पत्नी कहा गया है। भागवत पुराण में कहा गया है कि देवकी के पुत्र भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा के राजा कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से हुआ था। जब वासुदेव ने उन्हें कंस से बचाने के लिए जन्म के बाद आधी रात में यशोदा के घर गोकुल में छोड़ दिया, तो उनका पालन पोषण यशोदा ने किया।
बाल कृष्ण के अतीत के असंख्य विवरण भारत के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पाए जाते हैं। जिसमें यशोदा को ब्रह्मांड, माखनचोरी और उनके आरोपों का दर्शन मिला। यशोदा ने भी बलराम की परवरिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो रोहिणी के बेटे और सुभद्रा के भाई थे। उनकी एक बेटी का भी वर्णन किया गया है, जिसका नाम एकंगा था।

वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरा ने ब्रह्माजी से प्रार्थना की - 'हे देव! जब हम धरती पर पैदा होते हैं, तो हमें भगवान श्रीकृष्ण में अटूट श्रद्धा हो। ब्रह्माजी ने उन्हें 'तथास्तु' कहकर वर दिया। इसी वर के प्रभाव से ब्रजमंडल में सुमुख नामक गोप की पत्नी पाटला के गर्भ से धरा का जन्म यशोदा के रूप में हुआ। और उनकी शादी नंद से हुई थी। नंद पूर्व जन्म के द्रोण नामक वसु थे। भगवान श्री कृष्ण इन्हीं नंद-यशोदा के पुत्र बने।

कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में पाकर माता यशोदा बहुत खुश हैं। और बड़े ललक से कृष्ण का पालन-पोषण करते हैं।

कंस द्वारा भेजी गई पूतना गोपी-भेष में अपने स्तनों में कालकूट विष लगा कर यशोदा नंदन श्री कृष्ण को मारने के लिए आई थी। श्री कृष्ण ने पूतना का जीवन दूध के साथ पीना शुरू किये। शरीर छोड़ते समय पूतना श्री कृष्ण को लेकर मथुरा की ओर भागी।

उस समय श्री कृष्ण के साथ यशोदा की आत्मा भी चली गई। उनके जीवन में चेतना का संचार तब हुआ जब गौ-सुंदरियों ने श्रीकृष्ण को लाकर माता यशोदा की गोद में बिठा दिया।

माता यशोदा का प्यार पाने के बाद श्री कृष्ण इक्कीस दिन के हो गए। श्री कृष्ण को नीचे पालने में सुला आई थीं. तब कंस द्वारा उत्कच नाम का एक राक्षस आया और शकट में प्रवेश किया। वह शकट गिराकर श्रीकृष्ण को कुचल देना चाहता था। इससे पहले, श्रीकृष्ण ने शकट को उलट दिया और शकटासुर का अंत हो गया।

आखिरकार, अक्रूर जी श्री कृष्ण को मथुरा पुरी ले जाने के लिए आए। ऐसा लगा जैसे अक्रूर जी ने आकर यशोदा के हृदय पर वज्रपात प्रहार किया हो। पूरी रात श्री नंद जी और श्री यशोदा को समझाते रहे, लेकिन किसी भी कीमत पर वे अपने प्यारे बेटे को कंस के पास भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे।

यशोदा जी ने फिर भी अनुमति नहीं दी, केवल विरोध को छोड़कर, उन्होंने अपने आंसुओं से धरती को भिगोना शुरू कर दिया। श्री कृष्ण चले गए और यशोदा विक्षिप्त हो गईं - कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण से मिलने पर यशोदा जी का दिल शांत हो गया। माँ यशोदा ने राम-श्याम को फिर से अपनी गोद में रखकर नया जीवन पाया। भगवान ने अपनी लीला खत्म करने से पहले ही देवी यशोदा को गोलोक भेज दिया।

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